قوله: (توثقة دين) أي: جعلها وثيقة بدين. قوله: (بعين) لا دين، أو منفعة، قوله: (يمكن أخذه) أي: بان تكون مالية يصح بيعها. قوله: (وتصح زيادة رهن) أي: مرهون، إطلاقا للمصدر على اسم المفعول. قوله: (ورهن ما يصح بيعه) أي: من الأعيان دون المنافع، بقرينة ما قدمه بقوله: (توثقة دين بعين ... إلخ) فتدبر. قوله: (أو مؤجرا) يعني: لمستأجر، أو غيره. قوله: (أو معارا) أي: لمستعير، أو غيره. قوله: (العارية) إذا رهنت عند مستعير ولم يستعملها، ولم يأذن راهن، كما سيأتي.